समझौता है या नहीं: भुगतान की समय सीमा
| स्थिति | भुगतान की अधिकतम समय सीमा |
|---|---|
| लिखित समझौता है | समझौते में तय तारीख तक, लेकिन स्वीकृति से 45 दिन से अधिक नहीं |
| कोई लिखित समझौता नहीं | स्वीकृति या मानी गई स्वीकृति से 15 दिन के भीतर |
| खरीदार ने माल पर आपत्ति नहीं की | डिलीवरी के 15 दिन बाद माल को स्वीकार माना जाता है और गिनती वहीं से शुरू होती है |
Key Takeaways
- यह नियम MSMED Act, 2006 की धारा 15 से 24 में है और केवल उन माइक्रो और स्मॉल आपूर्तिकर्ताओं पर लागू होता है जिनका उद्यम पंजीकरण (Udyam) है। मीडियम उद्यम इसके दायरे में नहीं आते।
- लिखित समझौता होने पर भुगतान की अधिकतम सीमा 45 दिन है, और समझौता न होने पर भुगतान 15 दिन के भीतर करना होता है। गिनती माल या सेवा की स्वीकृति या मानी गई स्वीकृति की तारीख से शुरू होती है।
- देरी पर ब्याज बैंक दर का तीन गुना है और हर महीने चक्रवृद्धि होता है। 7 अक्टूबर 2026 से बैंक दर 5.75 प्रतिशत है, इसलिए यह दर लगभग 17.25 प्रतिशत सालाना बैठती है।
- आयकर अधिनियम की धारा 43B(h) के अनुसार माइक्रो और स्मॉल आपूर्तिकर्ता को देय राशि का खर्च खरीदार तभी घटा सकता है जब भुगतान निर्धारित समय सीमा के भीतर हो गया हो, वरना वह खर्च भुगतान वाले साल में ही मान्य होता है।
- देर से भुगतान की शिकायत MSME Samadhaan पोर्टल पर की जा सकती है, जो मामला संबंधित सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (MSEFC) को भेजता है।
- MSEFC के फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए खरीदार को आदेश की राशि का 75 प्रतिशत न्यायालय में जमा करना पड़ता है।
MSME 45 दिन का नियम क्या है
- छोटे कारोबारियों की सबसे बड़ी समस्या अक्सर बिक्री नहीं बल्कि समय पर पैसा मिलना होती है। बड़े खरीदार महीनों तक भुगतान रोक देते हैं और छोटे सप्लायर का कार्यशील पूंजी चक्र टूट जाता है। इसी समस्या को हल करने के लिए MSMED Act, 2006 में भुगतान की समय सीमा तय की गई है।
- धारा 15 के अनुसार अगर खरीदार और सप्लायर के बीच लिखित समझौता है तो भुगतान उसी तारीख तक होना चाहिए, लेकिन यह अवधि स्वीकृति की तारीख से 45 दिन से ज्यादा नहीं हो सकती। अगर कोई समझौता नहीं है तो स्वीकृति की तारीख के 15 दिन के भीतर भुगतान करना होगा।
यह नियम किस पर लागू होता है
- आपूर्तिकर्ता माइक्रो या स्मॉल उद्यम होना चाहिए और उसका उद्यम पंजीकरण (Udyam) होना जरूरी है।
- खरीदार कोई भी हो सकता है, चाहे कंपनी, फर्म, सरकारी संस्था या बड़ा कारोबारी।
- मीडियम उद्यम से खरीद पर 45 दिन का यह नियम और ब्याज का प्रावधान लागू नहीं होता।
- माल की बिक्री और सेवाएं दोनों इसके दायरे में आती हैं।
देरी होने पर ब्याज कितना लगेगा
- धारा 16 के अनुसार देरी की स्थिति में खरीदार को तय तारीख से भुगतान की तारीख तक RBI द्वारा अधिसूचित बैंक दर का तीन गुना ब्याज देना होगा, जो हर महीने चक्रवृद्धि होता है। यह ब्याज खरीदार और सप्लायर के बीच हुए किसी भी समझौते से कम नहीं किया जा सकता।
- RBI ने 7 अक्टूबर 2026 को बैंक दर बढ़ाकर 5.75 प्रतिशत की है। इसका मतलब यह है कि लागू होने वाली दर के आधार पर देरी पर ब्याज लगभग 17.25 प्रतिशत सालाना बनता है। असली गणना हमेशा उस अवधि में लागू बैंक दर के आधार पर होनी चाहिए।
आयकर की धारा 43B(h) का असर
- धारा 43B(h) माइक्रो और स्मॉल आपूर्तिकर्ताओं को देय राशि पर लागू होती है और वित्त वर्ष 2023-24 से प्रभावी है।
- अगर खरीदार ने तय समय सीमा (45 दिन या समझौता न होने पर 15 दिन) के भीतर भुगतान नहीं किया, तो वह खर्च उसी साल की आय से नहीं घटाया जा सकता।
- वह खर्च तब मान्य होगा जब असल में भुगतान कर दिया जाएगा, यानी भुगतान वाले साल में कटौती मिलेगी।
- इसका सीधा असर खरीदार के कर पर पड़ता है, इसलिए बड़े खरीदार अब समय पर भुगतान को प्राथमिकता देने लगे हैं।
देर से भुगतान की शिकायत कैसे करें
- सबसे पहले खरीदार को लिखित नोटिस या ईमेल भेजें, जिसमें चालान की संख्या, तारीख, राशि और देय ब्याज का उल्लेख हो।
- जवाब न मिलने पर MSME Samadhaan पोर्टल पर उद्यम पंजीकरण संख्या के साथ लॉगिन करके शिकायत दर्ज करें।
- शिकायत संबंधित राज्य की सूक्ष्म और लघु उद्यम सुविधा परिषद (MSEFC) के पास जाती है, जो पहले सुलह कराती है।
- सुलह विफल होने पर परिषद मध्यस्थता से मामला सुलझाती है और निर्धारित समय में फैसला देना होता है।
- फैसले के बाद खरीदार को अपील के लिए आदेश की राशि का 75 प्रतिशत जमा करना होता है।
सप्लायर के लिए जरूरी सावधानियां
- हर बिक्री के लिए चालान, डिलीवरी रसीद और खरीदार की स्वीकृति का रिकॉर्ड रखें, क्योंकि गिनती स्वीकृति की तारीख से शुरू होती है। खरीद आदेश या समझौते में 45 दिन से अधिक की अवधि न लिखवाएं, क्योंकि कानून के अनुसार वह मान्य नहीं होगी। अपने उद्यम पंजीकरण को चालू रखें और चालान पर Udyam नंबर जरूर लिखें, ताकि खरीदार को पता रहे कि आप इस सुरक्षा के हकदार हैं।
Frequently Asked Questions
MSME 45 दिन का नियम क्या है?
यह MSMED Act, 2006 का नियम है जिसके अनुसार माइक्रो और स्मॉल सप्लायर को भुगतान लिखित समझौते की तारीख तक करना होता है, जो स्वीकृति से 45 दिन से ज्यादा नहीं हो सकती।
अगर कोई लिखित समझौता न हो तो कितने दिन में भुगतान जरूरी है?
समझौता न होने पर भुगतान माल या सेवा की स्वीकृति या मानी गई स्वीकृति के 15 दिन के भीतर करना होता है।
देरी होने पर कितना ब्याज देना पड़ता है?
खरीदार को RBI द्वारा अधिसूचित बैंक दर का तीन गुना ब्याज, मासिक चक्रवृद्धि के साथ, देना पड़ता है। बैंक दर 5.75 प्रतिशत होने पर यह लगभग 17.25 प्रतिशत सालाना बैठता है।
क्या यह नियम मीडियम उद्यम पर भी लागू होता है?
नहीं, यह नियम और ब्याज का प्रावधान केवल उद्यम पंजीकरण वाले माइक्रो और स्मॉल आपूर्तिकर्ताओं पर लागू होता है।
धारा 43B(h) का खरीदार पर क्या असर पड़ता है?
अगर खरीदार ने माइक्रो या स्मॉल सप्लायर को समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं किया तो वह खर्च तब तक नहीं घटाया जा सकता जब तक भुगतान कर नहीं दिया जाता।
देर से भुगतान की शिकायत कहां करें?
MSME Samadhaan पोर्टल पर उद्यम पंजीकरण के साथ शिकायत दर्ज की जाती है, जो मामला राज्य की MSEFC को भेजता है।
क्या आपका भुगतान अटका हुआ है?
बकाया भुगतान की वसूली के लिए सही नोटिस, ब्याज की गणना और MSME Samadhaan पर शिकायत की प्रक्रिया जरूरी है। Growthora के साथ मुफ्त परामर्श बुक करें और हम आपकी शिकायत तैयार करने और वसूली की प्रक्रिया में मदद करेंगे।
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